Ved Vaani Vedas What Is Navadha Bhakti Ramcharitmanas Aranya Kand Say About This

Ved Vaani, Navadha Bhakti Ramcharitmanas: नवधा भक्ति का जिक्र धर्मग्रंथों में मिलता है, जिसका जिक्र दो युगों में किया गया है. सतयुग में प्रह्लाद ने पिता हिरण्यकशिपु से कहा था और फिर इसके बाद त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने मां शबरी से नवधा भक्त के बारे में कहा था. ‘नवधा भक्ति’ का अर्थ ‘नौ प्रकार से भक्ति’ से होता है. रामायण के रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में नवधा भक्ति का वर्णन मिलता है.

जब मां शबरी श्रीराम से कहती हैं, मैं नीच, अधम, मंदबुद्धि हूं तो मैं किस प्रकार से आपकी स्तुति करूं. भगवान श्रीराम शबरी द्वारा श्रद्धापूर्वक भेंट किए हुए बेरों को बड़े ही प्रेम से खाते हैं और इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं. इसके बाद भगवान मां शबरी को नवधा भक्ति के बारे में कुछ तरह से बताते हैं, जिसे तुलसीदास जी ने अपनी चौपाई में लिखा है…

नवधा भगति कहउं तोहि पाहीं, सावधान सुनु धरु मन माहीं।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा, दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

अर्थ है: मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूं. तू इसे सावधान होकर सुनना और मन में धारण करना. पहली भक्ति है संतों का सत्संग और दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम.

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गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

अर्थ है: तीसरी भक्ति है अभिमान से मुक्ति होकर गुरुजनों के चरण कमलों की सेवा करना और चौथी भक्ति है कपट को छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करना.

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।

अर्थ है: पांचवीं भक्ति वेदों में प्रसिद्धि है और छठी भक्ति में भगवान राम के शील की चर्चा की गई है कि इंद्रियों का निग्रह शील (अच्छा चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म में लगे रहना है.

सातवं सम मोहि मय जग देखा, मोतें संत अधिक करि लेखा।
आठवं जथालाभ संतोषा, सपनेहुं नहिं देखइ परदोषा॥

अर्थ हैं: सातवीं भक्ति संपूर्ण जगत को समभाव से मुझमें ओतप्रोत देखना और संतों को मुझसे भी श्रेष्ठ मानना है. आठवीं भक्ति है जो कुछ भी मिल जाए उसमें संतोष करना और सपने में भी पराए में कोई दोष न देखना

नवम सरल सब सन छलहीना, मम भरोस हियं हरष न दीना।
नव महुं एकउ जिन्ह कें होई, नारि पुरुष सचराचर कोई॥

अर्थ है: नौवीं भक्ति सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना है. हृदय में मेरा विश्वास रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य का न होना. इनमें से जिसके पास एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो.

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें, सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई. तो कहुं आजु सुलभ भइ सोई॥

अर्थ है: हे भामिनि! मुझे वही प्रिय है. फिर तुझमें तो यह सभी तरह की भक्ति निहित है. अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है.

 नवधा भक्ति के नौ प्रकार हैं…

  1. संत सत्संग
  2. रति
  3. गुरु की सेवा
  4. भगवद् संकीर्तन करना
  5. भगवान का मंत्रजप
  6. इंद्रिय निग्रह
  7. प्रत्येक जीव कोपरमात्म भाव से देखना  
  8. यथा लाभ संतोष
  9. सरलता

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